भोपाल से आई यह दर्दनाक खबर हर माता-पिता को झकझोर देने वाली है। बैरागढ़ इलाके में 12वीं कक्षा की एक छात्रा ने मामूली डांट से आहत होकर अपनी जान दे दी। जानकारी के अनुसार, छात्रा गुरुवार सुबह स्कूल नहीं जाना चाहती थी। इस पर उसकी मां ने उसे फटकार लगाई और पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह दी।
थोड़ी देर बाद जब परिवार के सदस्य अपने कामों में व्यस्त हो गए, तब छात्रा चुपचाप अपने कमरे में चली गई। कुछ ही देर बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। जब मां ने जाकर देखा, तो वह बेहोश पड़ी थी और पास में ज़हर की बोतल मिली।
परिजन तुरंत उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने इलाज के दौरान उसे मृत घोषित कर दिया। इस हादसे ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है।
मां का रो-रोकर बुरा हाल
घटना के बाद घर में मातम छा गया है। मां बार-बार यही कह रही है कि उसने सिर्फ बेटी को समझाने के लिए डांटा था, लेकिन उसे क्या पता था कि बात इतनी बढ़ जाएगी। परिजन लगातार बेहोश हो रहे हैं और माहौल शोक में डूबा हुआ है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, छात्रा शांत स्वभाव की थी और पढ़ाई में ठीक-ठाक थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह परेशान चल रही थी। वह अक्सर स्कूल जाने से मना करती थी और अपने कमरे में अकेले समय बिताती थी।
पड़ोसियों ने बताया कि मां-बेटी के बीच गुरुवार सुबह थोड़ी कहासुनी हुई थी, लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि छात्रा इतना बड़ा कदम उठा लेगी। पुलिस ने परिवार से बयान दर्ज किए हैं और घटनास्थल की जांच की
विशेषज्ञों ने दी मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की सलाह
घटना की जानकारी मिलते ही बैरागढ़ थाना पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी। प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि छात्रा ने मां की डांट से आहत होकर आत्महत्या की। पुलिस ने बताया कि घर में किसी तरह का विवाद या बाहरी दबाव नहीं था। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है और रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
इस घटना के बाद मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किशोरावस्था में बच्चे भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील होते हैं। छोटी-छोटी बातों पर वे गहरा तनाव महसूस करते हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों से सख्त लहजे में नहीं, बल्कि संवाद और समझदारी के साथ बात करें।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि आज के समय में बच्चों पर पढ़ाई, प्रतियोगिता और समाज की अपेक्षाओं का दबाव बहुत अधिक है। ऐसे में परिवारों को उनके मानसिक स्वास्थ्य पर उतना ही ध्यान देना चाहिए जितना उनकी पढ़ाई और करियर पर दिया जाता है।


