मोबाइल की बढ़ती लत और शरीर की जैविक घड़ी पर असर
एम्स भोपाल द्वारा किए गए एक हालिया शोध में यह चेतावनी दी गई है कि मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग, खासकर रात के समय, मानव शरीर की जैविक घड़ी (बायोलॉजिकल क्लॉक) को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
देर रात तक मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (ब्लू लाइट) मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव को रोकती है, जो नींद के लिए आवश्यक होता है। शोध में सामने आया कि लगातार नींद की कमी और असंतुलित स्लीप साइकिल से कोशिकाओं की मरम्मत प्रक्रिया बाधित होती है, जिससे शरीर में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि युवा वर्ग में मोबाइल की लत तेजी से बढ़ रही है, जो भविष्य में स्वास्थ्य के लिए बड़ा संकट बन सकती है।
रात को जागने की आदत और कैंसर के बीच संबंध
एम्स भोपाल के वैज्ञानिकों के अनुसार, जो लोग नियमित रूप से देर रात तक जागते हैं—चाहे मोबाइल, सोशल मीडिया या ऑनलाइन कंटेंट के कारण—उनमें हार्मोनल असंतुलन देखा जा रहा है। यह असंतुलन लंबे समय में इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है। शोध में यह भी संकेत मिला है कि लंबे समय तक नाइट अवेकनेस (रात में जागना) स्तन कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर और कुछ अन्य प्रकार के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है। डॉक्टरों ने चेताया कि यह खतरा धीरे-धीरे बढ़ता है और शुरुआती लक्षण अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है।
बचाव के उपाय और विशेषज्ञों की सलाह
एम्स भोपाल के विशेषज्ञों ने इस खतरे से बचाव के लिए कुछ जरूरी उपाय सुझाए हैं। उन्होंने सलाह दी है कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों का उपयोग बंद कर देना चाहिए। नियमित समय पर सोना और जागना, पर्याप्त नींद लेना और दिनचर्या में शारीरिक गतिविधि को शामिल करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, बच्चों और युवाओं में मोबाइल के सीमित उपयोग को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर समय रहते जीवनशैली में सुधार किया जाए, तो न केवल कैंसर बल्कि कई अन्य गंभीर बीमारियों के खतरे को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।


