भोपाल में क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय एक बाद फिर विवादों में है। इस बार आरोप है कि करीब 13 लाख रूपए कीमत का एक कमर्शियल वाहन मालिक की मौजूदगी और सहमति के बिना फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर किसी और के नाम ट्रांसफर कर दिया गया। बाद में रिकॉर्ड तो दुरुस्त हो गए, लेकिन दोषियों पर कार्रवाई और वाहन की बरामदगी अब भी सवालों के घेरे में है।

क्या है पूरा मामला?
सिद्धार्थ लेक सिटी निवासी धीरेंद्र सिंह चौहान ने 2016 में टाटा 407 (MP04 GB 0670) खरीदी थी। शुरुआती तौर पर वाहन को एक कंपनी को किराए पर दिया गया, जहां से कुछ समय तक भुगतान मिला, फिर रुक गया। वाहन लौटाने की मांग पर टालमटोल शुरू हुई। मार्च 2023 में परिवहन विभाग के ऑनलाइन पोर्टल पर जांच करने पर चौहान को झटका लगा – वाहन मनोज कुमार पांडे के नाम ट्रांसफर दिख रहा था।
चौहान का दावा है कि उन्होंने कभी आरटीओ जाकर ट्रांसफर की प्रक्रिया नहीं की, न कोई आवेदन दिया, न हस्ताक्षर। इसके बाद उन्होंने पुलिस और आरटीओ में शिकायत दर्ज कराई।
जांच में क्या निकला?
आंतरिक पड़ताल में सामने आया कि ट्रांसफर ऑनलाइन सिस्टम के जरिए फर्जी दस्तावेज़ों से किया गया। सुनवाई के दौरान कथित खरीदार भुगतान का प्रमाण नहीं दे पाया। नतीजतन, मोटर वाहन अधिनियम के तहत ट्रांसफर नोटिस रद्द कर वाहन का पंजीकरण फिर से मूल मालिक के नाम बहाल कर दिया गया।
ऑनलाइन सिस्टम की खामियां
अधिकारियों ने माना कि उस समय के OTP-आधारित ऑनलाइन ट्रांसफर सिस्टम में खामियां थीं। OTP किसी भी मोबाइल नंबर पर जनरेट हो सकता था। अब व्यवस्था बदली गई है और OTP केवल वाहन मालिक के रजिस्टर्ड नंबर पर ही भेजा जा रहा है।
अब भी अनसुलझे सवाल
रिकॉर्ड सुधार के बावजूद कई प्रश्न कायम हैं:
- फर्जी ट्रांसफर कराने वालों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
- बिचौलियों की भूमिका क्या थी?
- वाहन की बरामदगी कब होगी?
मामले में दोनों पक्षों को परिवहन आयुक्त के समक्ष अपील का अधिकार है। लेकिन जब तक जवाबदेही तय नहीं होती, यह केस ऑनलाइन प्रक्रियाओं की सुरक्षा और निगरानी पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।


