
मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में आ गई है। जिलों के कामकाज की समीक्षा के दौरान हुई उच्चस्तरीय वर्चुअल बैठक में सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हुए। बैठक में मौजूद अफसरों के सामने ही सिस्टम की वह परतें खुलीं, जिन पर आम तौर पर बात नहीं होती।
ईमानदारी पर शक नहीं, गलत करने वालों पर कार्रवाई हो
बैठक के दौरान मुख्य सचिव अनुराग जैन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर कहीं भी अवैध लेन-देन या भ्रष्टाचार हो रहा है, तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि किसी भी स्तर पर शिकायत मिले तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं। इस टिप्पणी के बाद कई जिलों से जुड़े अधिकारी असहज दिखे।
शिकायतों का अंबार, सुनवाई ही नहीं
रिव्यू में सामने आया कि जनता की शिकायतें बड़ी संख्या में लंबित हैं। जिले और संभाग स्तर से ऊपर जाने वाली शिकायतें भी महीनों से अटकी हुई हैं।
- 100 दिन से ज्यादा पुरानी शिकायतें : 1.7 लाख से अधिक
- उच्च स्तर (एल-3/एल-4) पर लंबित : 2.75 लाख +
- जिन शिकायतों पर अब तक नज़र ही नहीं डाली गई : करीब 99 हजार
यह स्थिति बताती है कि सीएम हेल्पलाइन जैसे तंत्र भी जमीनी स्तर पर प्रभावी नहीं दिख रहे।
पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी पर सख्ती
इंदौर से आई एक शिकायत में एफआईआर दर्ज न होने का मामला उठा। वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान संबंधित पुलिस अधिकारी स्क्रीन पर मौजूद नहीं थे और फोन भी बंद मिला। इस पर मुख्य सचिव ने सख्त निर्देश दिए कि भविष्य में ऐसी बैठकों में एसपी की उपस्थिति अनिवार्य होगी, भले ही डीजीपी मौजूद हों या नहीं।
राज्य के डीजीपी कैलाश मकवाना का नाम लेते हुए यह भी कहा गया कि फील्ड लेवल पर अनुशासन सुनिश्चित किया जाए।
संवेदनशील इलाके और कानून-व्यवस्था
- प्रदेश में 1343 गलियां/बस्तियां पुलिस मूवमेंट के लिहाज से संवेदनशील चिन्हित
- 24 जिलों में जोनल प्लान तैयार, शेष को 3 महीने की डेडलाइन
- भिंड, मुरैना, शहडोल, जबलपुर और नरसिंहपुर में अवैध खनन व असामाजिक गतिविधियों पर विशेष अभियान के निर्देश
एससी-एसटी मामलों और मुआवजे पर चिंता
अनुसूचित जाति एवं जनजाति से जुड़े अपराधों में पीड़ितों को राहत राशि देने में देरी सामने आई। हजारों केस लंबित हैं। वहीं 20 से ज्यादा जिलों में हिट एंड रन मामलों में अब तक एक रुपया भी मुआवजा नहीं दिया गया—यह तथ्य चौंकाने वाला रहा।
ई-केवाईसी में बड़े शहर पिछड़े
समग्र आईडी की ई-केवाईसी में भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहर सबसे पीछे पाए गए।
- 42 विभागों की 139+ योजनाओं में ई-केवाईसी अनिवार्य
- 1.65 करोड़ डुप्लीकेट समग्र हटाए जा चुके
- करीब 2 करोड़ ई-केवाईसी अभी भी बाकी
नामांतरण में लेन-देन का उदाहरण
बैठक में एक नामांतरण शिकायत का जिक्र हुआ, जिसमें पहले जांच रिपोर्ट में आरोप गलत बताए गए। बाद में शिकायतकर्ता ने दावा किया कि एसडीएम-पटवारी द्वारा 7.5 लाख रुपये में सौदा तय किया गया। दोबारा जांच में आरोप सही पाए गए। इस उदाहरण ने सिस्टम की आंतरिक जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए।
प्रशासनिक फेरबदल
आनंदपुर धाम विवाद के बाद सरकार ने अशोक नगर कलेक्टर को हटाकर नई जिम्मेदारी दी। कर्मचारी चयन मंडल के संचालक को नया कलेक्टर नियुक्त किया गया और अन्य अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।
यह समीक्षा बैठक सिर्फ एक औपचारिक रिव्यू नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था का आईना बन गई। भ्रष्टाचार के आरोप, शिकायतों की अनदेखी, पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही और डिजिटल प्रक्रियाओं की धीमी रफ्तार – ये सभी मुद्दे अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं। आने वाले महीनों में सरकार इन निर्देशों पर कितना अमल कर पाती है, यही असली परीक्षा होगी।


