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    CBI ऑफिस में आदिवासी का ASI पर धनुष-बाण से हमला, युवक था 30 वर्षो से परेशान

    लखनऊ के नवल किशोर रोड पर शुक्रवार की सुबह उस समय हड़कंप मच गया जब एक व्यक्ति ने CBI कार्यालय के सामने खड़े एएसआई वीरेंद्र सिंह पर धनुष-बाण से हमला कर दिया। इस असाधारण घटना के पीछे एक ऐसी कहानी निकली जिसने देश के न्याय तंत्र और आदिवासी समाज के बीच व्याप्त असंतोष पर एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

    हमलावर कौन है?

    हमले का आरोपी दिनेश मुर्मू, बिहार के मुंगेर जिले के खड़कपुर का निवासी है और आदिवासी समुदाय से आता है। पुलिस की पूछताछ में उसने बताया कि वह रेलवे में 1993 से कार्यरत था और उसी दौरान उसने एक भ्रष्ट कर्मचारी को 200 रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ा था। लेकिन, उसने दावा किया कि शिकायत करने के बावजूद CBI ने उल्टा उसे ही आरोपी बना दिया और उसकी नौकरी छीन ली गई।

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    दिनेश का कहना है कि “CBI की जांच में मुझे फंसा दिया गया। मेरी नौकरी गई, परिवार उजड़ गया, समाज में मेरी इज्जत चली गई।” दिनेश ने अपने बयान में खुद को “पौराणिक न्याय का दूत” बताते हुए कहा, “जैसे भगवान राम ने अन्याय के खिलाफ तीर उठाया, वैसे ही मैंने भी उठाया।”

    क्या यह सिर्फ एक अपराध है, या दशकों से जला आ रहा न्याय का अलाव?

    दिनेश मुर्मू वर्षों से बदले की भावना में जल रहा था। उसने कहा कि उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। “मैंने वही किया जो वर्षों से मेरे मन में था। यह अपराध नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ मेरी न्यायिक प्रतिक्रिया है।”

    दिनेश की यह सोच, भले ही कानून के दायरे में अपराध हो, लेकिन यह देश की न्याय प्रणाली के लिए एक चेतावनी है — क्या हमने एक आदिवासी को न्याय देने में चूक की?

    CBI अधिकारी की स्थिति खतरे से बाहर

    घटना में घायल हुए CBI ASI वीरेंद्र सिंह पिछले 25 वर्षों से CBI में हैं, और अब खतरे से बाहर हैं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजेश श्रीवास्तव के अनुसार, तीर सीने के बाईं ओर 5 सेमी गहरा घुसा था, लेकिन सर्जरी के बाद अब हालत स्थिर है।

    वीरेंद्र सिंह वर्ष 1993 में रेलवे घोटाले की जांच में शामिल थे, जिसके चलते कई कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया था — दिनेश मुर्मू उन्हीं में से एक था।

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    आदिवासी समुदाय के लिए यह घटना क्या संकेत देती है?

    दिनेश मुर्मू केवल एक आरोपी नहीं है, वह एक आदिवासी प्रतिनिधि बन गए है जो यह कहता है कि “सिस्टम ने उसके साथ अन्याय किया।” उसकी इस प्रतिक्रिया में वर्षों की व्यवस्था से उपजी पीड़ा, हताशा और असहायता झलकती है।

    • क्या एक आदिवासी की न्याय की पुकार इतनी कमजोर थी कि उसे धनुष-बाण उठाने पर मजबूर होना पड़ा?
    • क्या हमारे न्यायिक और जांच तंत्र में आदिवासी आवाजों को समान अवसर मिलते हैं?
    • क्या दिनेश मुर्मू जैसे लोग न्याय की उम्मीद में पूरे जीवन को नष्ट होते देख रहे हैं?

    क्या कहती है पुलिस?

    डीसीपी सेंट्रल आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि आरोपी के खिलाफ हत्या की कोशिश और शस्त्र अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है। आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है और विस्तृत पूछताछ जारी है।

    न्याय का प्रश्न अभी भी खुला है

    यह हमला केवल एक शख्स पर हमला नहीं, बल्कि एक सिस्टम पर तीखा सवाल भी है। क्या हमारी व्यवस्था ने सच में एक आदिवासी युवक को न्याय नहीं दिया? क्या उसकी पुकार इतने सालों तक अनसुनी रही कि उसने न्याय के लिए पौराणिक प्रतीक चुन लिया?

    अब समय है कि इस घटना को सिर्फ एक अपराध के तौर पर न देख कर, इसे एक व्यवस्था की कमी के रूप में भी समझा जाए।

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    आपका क्या मानना है? क्या दिनेश को दोबारा निष्पक्ष सुनवाई मिलनी चाहिए? क्या पुरानी जांचों की समीक्षा होनी चाहिए?

    कमेंट करें, शेयर करें — सवाल उठाएं, क्योंकि न्याय की चुप्पी सबसे बड़ा अन्याय है।

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