आस्था के बीच पर्यावरण की अनदेखी
नर्मदा नदी में हाल ही में लगभग 11 हजार लीटर दूध अर्पित किए जाने की घटना ने नई बहस छेड़ दी है। यह कार्य धार्मिक आस्था के तहत किया गया, लेकिन अब इसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ गई है। लोगों की भावनाएं जुड़ी होने के बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बड़े स्तर पर किए गए अर्पण से नदी के प्राकृतिक संतुलन पर असर पड़ता है। आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।
दूसरे चरण में बढ़ सकता है प्रदूषण
विशेषज्ञों के अनुसार, दूध के नदी में मिलते ही प्रदूषण तुरंत नहीं दिखता, बल्कि इसका असर धीरे-धीरे सामने आता है। इसे प्रदूषण का दूसरा चरण कहा जा रहा है, जिसमें दूध पानी में सड़ने लगता है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं। इससे पानी की गुणवत्ता खराब होती है और उसमें घुली ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। इसका असर आने वाले दिनों में और अधिक गंभीर रूप में देखने को मिल सकता है।
जलीय जीवों के लिए खतरे की घंटी
नर्मदा में मौजूद मछलियां और अन्य जलीय जीव इस प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। पानी में ऑक्सीजन की कमी होने पर इन जीवों के लिए सांस लेना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस वजह से बड़ी संख्या में मछलियों और अन्य जीवों की मौत हो सकती है। इससे नदी का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होगा, जिसका असर लंबे समय तक बना रहेगा।
महीनों तक दूषित रह सकता है पानी
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में डालने के बाद पानी को पूरी तरह साफ होने में महीनों लग सकते हैं। इस दौरान नदी का पानी उपयोग के लायक नहीं रहता और इससे आसपास के लोगों को भी परेशानी होती है। पीने, सिंचाई और अन्य कामों के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी प्रभावित होता है।
यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि धार्मिक कार्यों को करते समय पर्यावरण का ध्यान रखना कितना जरूरी है। अगर हम समय रहते सावधान नहीं हुए, तो इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतने पड़ सकते हैं।


