भोपाल में आयुष्मान भारत योजना के तहत निजी अस्पतालों के लंबित भुगतान को लेकर डॉक्टर और अस्पताल संचालक बुधवार को प्रदर्शन पर उतर आए। प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के बैनर तले अस्पताल संचालक और डॉक्टर जेपी अस्पताल परिसर स्थित आयुष्मान योजना के कार्यालय पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से इलाज के बदले लंबित राशि का जल्द भुगतान करने की मांग की। अस्पताल संगठनों का दावा है कि कई निजी अस्पतालों को पिछले 5 से 6 महीने से आयुष्मान योजना के तहत किए गए उपचार का भुगतान नहीं मिला है।
5-6 महीने से भुगतान अटका होने का दावा
प्रदर्शन के दौरान अस्पताल संचालकों ने कहा कि लंबे समय से आयुष्मान योजना की राशि लंबित होने के कारण निजी अस्पतालों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। उनके अनुसार भुगतान नहीं मिलने से दवा विक्रेताओं, कर्मचारियों और अस्पताल से जुड़ी अन्य सेवाओं के भुगतान में परेशानी आ रही है। यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉ. धनंजय मिश्रा के अनुसार, भोपाल में करीब 468 निजी अस्पताल हैं और प्रत्येक अस्पताल का औसतन डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक का भुगतान लंबित होने का दावा किया गया है। अस्पताल संगठनों ने सरकार से लंबित राशि जल्द जारी करने की मांग की है।
NABH की अनिवार्यता को लेकर भी विरोध
प्रदर्शन का दूसरा प्रमुख मुद्दा आयुष्मान योजना से जुड़े निजी अस्पतालों के लिए NABH मान्यता की अनिवार्यता है। अस्पताल संगठन चाहते हैं कि NABH को अनिवार्य करने के बजाय स्वैच्छिक और प्रोत्साहन आधारित व्यवस्था रखी जाए। उनका कहना है कि अस्पतालों का आकार, बेड क्षमता, संसाधन और स्थानीय परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं, इसलिए सभी अस्पतालों पर एक जैसी शर्त लागू करने से छोटे और मध्यम अस्पताल प्रभावित हो सकते हैं। इससे पहले सरकार ने चार बड़े शहरों—भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर—के कुछ निजी अस्पतालों को NABH प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए छह महीने की अतिरिक्त मोहलत दी थी। यह अवधि 30 सितंबर को समाप्त हो रही है।
1 अक्टूबर से डी-एम्पैनलमेंट की आशंका
अस्पताल संगठनों ने दावा किया है कि 1 अक्टूबर से भोपाल समेत चार बड़े शहरों में बड़ी संख्या में अस्पतालों को आयुष्मान योजना के पैनल से बाहर किया जा सकता है। हालांकि, इस संभावित कार्रवाई को लेकर अंतिम आधिकारिक सूची या आदेश सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने की बात भी रिपोर्टों में कही गई है। निजी अस्पताल संगठनों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम अस्पताल योजना से बाहर होते हैं तो आयुष्मान कार्डधारक मरीजों के इलाज के विकल्प सीमित हो सकते हैं और सरकारी व अन्य सूचीबद्ध अस्पतालों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। संगठन ने सरकार से दोनों मुद्दों पर तत्काल हस्तक्षेप और अस्पताल प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि मांगों का समाधान नहीं होने पर प्रदेश स्तर पर आंदोलन किया जा सकता है।


